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वर्ल्ड टीबी डे 24 मार्च : बच्चों में टीबी के बारे में सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने की जरूरत

नोएडा (विनायक गुप्ता) : तपेदिक (टीबी) किसी भी उम्र, जाति या वर्ग को प्रभावित कर सकता है और यह दुनिया भर में होने वाली मौतों के शीर्ष 10 कारणों में एचआईवी व मलेरिया से ऊपर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार 2015 में दुनिया भर में टीबी के 1.04 करोड़ नए मामले सामने आए थे। टीबी के कारण होने वाली कुल मौतों में से करीब 60 फीसदी मौतें 6 देषों में होती है, जिनमें से सबसे अधिक मौतें भारत में हुई और उसके बाद इंडोनेषिया, चीन, नाइजीरिया, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका में। डब्ल्यूएचओ के अनुसार हर साल भारत में 22 लाख लोगों को टीबी होता है और अनुमान के अनुसार इस बीमारी से करीब 2,20,000 लोग सालाना मरते हैं। हालांकि बहुत कम ही लोग जानते हैं कि यह बीमारी बच्चों को भी प्रभावित करती है। 2015 में अनुमान के अनुसार, दुनिया भर में करीब 10 लाख बच्चे टीबी के शिकार हुए और उनमें से 1,70,000 बच्चों की मौत टीबी (एचआईवी से संक्रमित बच्चों को छोड़कर) के कारण हुई।

भारत में टीबी के कुल मामलों में से 10 फीसदी बच्चों में होते हैं लेकिन सिर्फ 6 फीसदी का ही पता चल पाता है। बच्चों में टीबी को अक्सर हेल्थ केयर प्रदाता बहुत अधिक ध्यान नहीं देते हैं क्योंकि बच्चों में इसकी जांच और इलाज करना बहुत मुश्किल होता है। वर्ल्ड टीबी डे, 24 मार्च 2017 ऐसा अवसर है, जब बच्चों में टीबी के बढ़ते मामलों के प्रति जनता में जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। फोर्टिस फ्लाइट लेफ्टिनैंट राजन ढ़ल हॉस्पिटल, नई दिल्ली के डायरेक्टर (पीडियाट्रिक्स) डॉ. राहुल नागपाल ने कहा, ’’भारत में बच्चों में टीबी के मामलों में काफी तेजी से बढ़ोतरी हुई है। हर महीने मेरे पास टीबी के 7 से 10 नए मामले आते हैं। 5 वर्श से कम आयु वाले बच्चों को टीबी से प्रभावित और ओपीडी में देखना बेहद दुखद होता है लेकिन सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि बच्चों में टीबी, उसकी उचित जांच और इलाज को लेकर लोगों में जागरूकता नहीं है। सबसे कम उम्र के बच्चे में टीबी का मामला मेरे सामने आया था। इस नवजात का जन्म समयपूर्व हुआ था और महज 1500 ग्राम के इस षिषु को जन्म से ही टीबी थी। मैंने ऐसे कई मामले देखे हैं लेकिन मुझे यह मामला इसलिए याद रहा क्योंकि बच्चे की मां को गर्भाषय का टीबी था और उसे इस बात की जानकारी नहीं थी। कई लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होती है कि टीबी कहीं पर भी हो सकती है और किसी से भी ट्रांसफर हो सकती है। बच्चों में टीबी के 60 फीसदी मामले फेफड़ों से जुड़े होते हैं जबकि बाकी 40 फीसदी फेफड़ों के अतिरिक्त अन्य अंगों में होते हैं और टीबी के मामलों में हर साल 20 से 30 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है। वहीं, लोगों को इसके बारे में बहुत कम जानकारी है।’’यह जानना बहुत जरूरी है कि टीबी एक ऐसी बीमारी है, जिसकी रोकथाम और इलाज दोनों संभव है। बचपन में होने वाले टीबी से निपटना बहुत मुष्किल और जरूरी होता है क्योंकि इसकी जांच और इलाज में ढेर सारी चुनौतियां होती हैं। जन्म के समय बच्चों को बीसीजी का टीका लगाना अनिवार्य होता है। 5 साल से कम उम्र के बच्चे में अगर टीबी के लक्षण दिखें तो मैनटॉक्स टेस्ट कराएं, जो वयस्कों के लिए बेहद किफायती और विष्वसनीय स्क्रीनिंग टेस्ट है और इसे लक्षण जांचने के लिए किया जाता है। हालांकि इस टेस्ट की जांच से उन बच्चों में लक्षण ढूंढना बहुत मुश्किल है, जिसे बीसीजी टीका लगाया गया हो। बच्चों में टीबी की बीमारी के लक्षणों और संकेतों में निम्नलिखित शामिल हैंः

  1. खांसी
  2. बीमारी या कमजोरी, आलस्य का अहसास, उदास रहना
  3. वजन घटना या विकास नहीं होना
  4. बुखार, रात में पसीना आना

बच्चों के शरीर के अन्य अंगों में टीबी के लक्षण प्रभावित हिस्से पर निर्भर करते हैं। नवजात, युवा बच्चों और ऐसे बच्चे जिनके शरीर की प्रतिरोधी क्षमता घट गई हो (जैसे एचआईवी से प्रभावित बच्चे) में टीबी का गंभीर संक्रमण होने का खतरा होता है जैसे टीबी मेनिनजाइटिस या डिसेमिनेटेड टीबी बीमारी। बच्चों और नवजात शिशुओ में टीबी के इलाज के लिए पीडियाट्रिक एक्स्पर्ट की सलाह लेनी चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि बच्चा या जिस किसी अन्य का टीबी इलाज चल रहा हो उसे पूरा कोर्स करना चाहिए और डॉक्टर के निर्देषानुसार दवाएं लेनी चाहिए। बच्चों को टीबी की दवाई आमतौर पर उनके वजन के अनुसार दी जाती है और इसलिए प्रत्येक बच्चे के लिए इलाज कस्टमाइज किया जाएगा। जांच के लिए बार-बार ब्लड सैंपल लेना भी एक समस्या है क्योंकि दर्द सहना न तो बच्चों के लिए आसान होता है और न ही उनके अभिभावकों के लिए। फोर्टिस फ्लाइट लेफ्टिनैंट राजन ढल हॉस्पिटल, नई दिल्ली के फैसिलिटी डायरेक्टर श्री संदीप गुदुरू ने बताया, ’’बच्चों में टीबी को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है और इसके बारे में डॉक्टर को नहीं बताया जाता। पल्मोनरी टीबी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए कई अभियान चलाए जा रहे हैं लेकिन हमें एक्स्ट्रा-पल्मोनरी टीबी के बारे में भी लोगों की जानकारी बढ़ानी होगी। इसके अलावा बच्चों में मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंस (एमडीआर-टीबी) की ओर भी देखभाल करने वालों का ध्यान नहीं जाता है। अगली पीढ़ी टीबी मुक्त हो इसके लिए सरकारी और निजी हेल्थकेयर प्रदाताओं को एक ही मंच पर आकर काम करने की जरूरत है।’’टीबी के खिलाफ लड़ाई में काफी प्रगति की गई है और 2000 से लेकर अभी तक 4.3 करोड़ लोगों की जिंदगी बचाई जा चुकी है लेकिन अभी यह लड़ाई आधी ही जीती गई है। अब भी 4000 से अधिक लोग रोजाना इस संक्रामक बीमारी से लगातार मर रहे हैं। टुबरकुलोसिस से सबसे अधिक प्रभावित गरीब, संवेदनषील और हाशिए पर पड़ा वर्ग होता है। डब्ल्यूएचओ ने इस साल ’’यूनाइट टु एंड टुबरकुलोसिस’’ के लिए विभिन्न देशो से योगदान करने को कहा है। डब्ल्यूएचओ ने यह कदम तक उठाया है, जब सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी) का युग षुरू होने जा रहा है। 2030 तक टुबरकुलोसिस समाप्त करना एसडीजी का लक्ष्य और डब्ल्यूएचओ एंड टीबी रणनीति का भी लक्ष्य है। फोर्टिस फ्लाइट लेफ्टिनेंट राजन ढल अस्पताल, वसंत कुंज 150 बिस्तरों की सुविधा वाला एनएबीएच मान्यता प्राप्त मल्टी-स्पेष्यलिटी, टर्षियारी केयर अस्पताल है जहां व्यापक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जाती हैं। अस्पताल भारत में वर्ल्ड क्लास इंटीग्रेटेड हैल्थकेयर डिलीवरी सिस्टम तैयार करने की फोर्टिस हैल्थकेयर की दूरगामी सोच का परिणाम है। प्रीवेंटिव हैल्थ तथा इमरजेंसी सेवाओं के क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं तथा अत्याधुनिक उपचार टैक्नोलॉजी समेत अस्पताल में सभी कुछ उपलब्ध है। इसकी हैल्थकेयर टीम में देश- विदेश के प्रतिश्ठित संस्थानों के स्वास्थ्य पेषेवर षामिल हैं जो संपूर्ण एवं दयाभाव के साथ मरीज़ों की देखभाल के लिए समर्पित हैं।

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